Published on: 18 Apr 2026
इन्दिरा गाँधी विश्वविद्याल मीरपुर, रेवाड़ी के हिंदी विभाग द्वारा 'साहित्य-संस्कृति संवाद' श्रृंखला के अंतर्गत महान साहित्यकार बाबू बालमुकुंद गुप्त की जन्मस्थली 'गुड़ियानी धाम' के लिए एक दिवसीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्रा का आयोजन किया गया। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को हिंदी साहित्य के अनमोल स्तंभ बाबू बालमुकुंद गुप्त की विरासत और उनके सांस्कृतिक अवदान से रूबरू कराना था।
कुलसचिव प्रोफेसर दिलबाग सिंह ने विश्वविद्यालय परिसर से यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि साहित्यिक भ्रमण केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास से साक्षात्कार है बाबू बालमुकुंद गुप्त जैसे मनीषियों के पदचिह्नों पर चलकर ही विद्यार्थी अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति गर्व का अनुभव कर सकते हैं। अधिष्ठाता शैक्षणिक मामले प्रोफेसर सुनील कुमार ने हिंदी विभाग के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे भ्रमणों से विद्यार्थियों का न केवल बौद्धिक विकास होता है, बल्कि वे अपनी जड़ों और गौरवशाली इतिहास से भी जुड़ते हैं। अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रोफेसर करण सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए इस यात्रा को अकादमिक शोध और सांस्कृतिक चेतना के लिए मील का पत्थर बताया। निदेशक, रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्रोफेसर पंकज त्यागी ने कहा कि आज के डिजिटल युग में अपनी साहित्यिक जड़ों को पहचानना अनिवार्य है। गुप्त जी ने जिस निर्भीकता से शिव शंभू के चिट्ठे लिखे वह आज के शोधार्थियों के लिए सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा है।
गुड़ियानी पहुँचने पर 'साहित्य-संस्कृति संवाद' के परिप्रेक्ष्य में 'बाबू बालमुकुंद गुप्त की विरासत' विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पत्रकार मनोज गोयल (गुडियानी) ने गुप्त जी के ऐतिहासिक 'शिवशंभु के चिट्ठे' और उनकी निर्भीक पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने तत्कालीन समाज और राजनीति को दिशा दी। विद्यार्थियों ने गुप्त जी के पैतृक स्थल का भ्रमण किया और उनके जीवन दर्शन को समझा।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए गुड़ियानी धाम परिसर में विश्वविद्यालय दल और सरपंच श्री नरेन्द्र (गुडियानी)और स्थानीय पंचायत द्वारा संयुक्त रूप से पौधारोपण किया गया। इस दौरान बाबू बालमुकुंद गुप्त परिषद के महासचिव श्री सत्यवीर नाहड़िया के सहयोग से सरपंच श्री नरेन्द्र जी ने विश्वविद्यालय के दल का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए ग्राम पंचायत गुड़ियानी की ओर से हर संभव सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का यहां आना हमारे गांव के लिए गौरव की बात है। हम चाहते हैं की नई पीढ़ी गुप्त जी की इस विरासत को संजोने में अपनी भूमिका निभाए।
कार्यक्रम के समापन सत्र में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजु पुरी द्वारा सरपंच को शाल और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। विभागाध्यक्ष ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य केवल किताबों तक सीमित नहीं है, वह समाज और संस्कृति के साथ निरंतर संवाद का नाम है। हमारा उद्देश्य विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान से बाहर निकालकर व्यावहारिक धरातल पर साहित्य से जोड़ना है।
इस यात्रा ने विद्यार्थियों में एक नई ऊर्जा और सांस्कृतिक चेतना का संचार किया। शोधार्थियों के लिए यह यात्रा शोध की नई दृष्टि प्रदान करने वाली रही, वहीं विद्यार्थियों के लिए अपने क्षेत्र के महान साहित्यकार को जानने का यह एक दुर्लभ अवसर था। अंत में सभी ने इस प्रेरणादायी यात्रा के सफल आयोजन के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त किया।
इस यात्रा में विभाग के सभी प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी, श्री नितिन, श्रीमती उषा शामिल रहे। सभी ने इस अनुभव को अपने जीवन की एक अविस्मरणीय कड़ी बताया।